अनुभूति

अंतस की पुकार पर चलती कलम

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मैं तूफान में चलने का आदी हूं

Posted On: 2 Aug, 2011 में

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मैं तूफ़ानों मे चलने का आदी हूं..
तुम मत मेरी मंजिल आसान करो..

हैं फ़ूल रोकते, काटें मुझे चलाते..
मरुस्थल, पहाड चलने की चाह बढाते..
सच कहता हूं जब मुश्किलें ना होती हैं..
मेरे पग तब चलने मे भी शर्माते..
मेरे संग चलने लगें हवायें जिससे..
तुम पथ के कण-कण को तूफ़ान करो..

मैं तूफ़ानों मे चलने का आदी हूं..
तुम मत मेरी मंजिल आसान करो..

अंगार अधर पे धर मैं मुस्काया हूं..
मैं मर्घट से ज़िन्दगी बुला के लाया हूं..
हूं आंख-मिचौनी खेल चला किस्मत से..
सौ बार म्रत्यु के गले चूम आया हूं..
है नहीं स्वीकार दया अपनी भी..
तुम मत मुझपर कोई एह्सान करो..

मैं तूफ़ानों मे चलने का आदी हूं..
तुम मत मेरी मंजिल आसान करो…

शर्म के जल से राह सदा सिंचती है..
गती की मशाल आंधी मैं ही हंसती है…
शोलो से ही श्रिंगार पथिक का होता है..
मंजिल की मांग लहू से ही सजती है..
पग में गती आती है, छाले छिलने से..
तुम पग-पग पर जलती चट्टान धरो…

मैं तूफ़ानों मे चलने का आदी हूं..
तुम मत मेरी मंजिल आसान करो..

फूलों से जग आसान नहीं होता है…
रुकने से पग गतीवान नहीं होता है…
अवरोध नहीं तो संभव नहीं प्रगती भी..
है नाश जहां निर्मम वहीं होता है..
मैं बसा सुकून नव-स्वर्ग “धरा” पर जिससे…
तुम मेरी हर बस्ती वीरान करो..

मैं तूफ़ानों मे चलने का आदी हूं..
तुम मत मेरी मंजिल आसान करो..

मैं पन्थी तूफ़ानों मे राह बनाता…
मेरा दुनिया से केवल इतना नाता..
वेह मुझे रोकती है अवरोध बिछाकर..
मैं ठोकर उसे लगाकर बढ्ता जाता..
मैं ठुकरा सकूं तुम्हें भी हंसकर जिससे..
तुम मेरा मन-मानस पाशाण करो..

मैं तूफ़ानों मे चलने का आदी हूं..
तुम मत मेरी मंजिल आसान करो..

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7 प्रतिक्रिया

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नवीनतम प्रतिक्रियाएंLatest Comments

bdsingh के द्वारा
August 25, 2013

मैं तूफानों में चलने का आदी हूँ। बहुत अच्छी रचना।

Mohinder Kumar के द्वारा
April 24, 2012

मनीष, सुन्दर भावाव्यक्ति, आपने सत्य लिखा है कि कठियाईयों से गुजर कर ही मनुष्य ऊंचाईयों को छू सकता है.

अलीन के द्वारा
February 2, 2012

मनीष मल्होत्रा जी, नमस्कार! पानी की धार की तरह कविता जो पत्थरों को चीरकर जमीं पर गिरती है..

yogesh chauhan के द्वारा
October 9, 2011

it would be better if u pay ur full attention towards the accuracy of words

harish sharma Alld. के द्वारा
September 24, 2011

wawwwwwwwwwwwwwwwwwwwwwwwwwwwwwww nice poem

Abhishek Tripathi के द्वारा
September 4, 2011

Vrtman samay k ghornirashavadi vatavaran mai apki ye kavita sambal ka kam karegi. Apki kavita Phadte phadte rashtra kavi Dinkar ji ki shresth rachna ‘Rashmirathi se ye Pakitiya yad aa jo Karn k mukh se prashphutit hui hai CHADNI PUSHPCHAYA MAEPAL, NAR BHLE BANE SUMADHUR KOMAL PAR AMRAT KLESH KA PIYE BINA AATAP ANDHD MAE JIYE BINA WAH PURUSH NAHI KHLA SAKTA WIGHNO KO NAHI HILA SAKTA UDHTE JO JHANJHAWATO MAE PEETE JO VARI PRAPATO MAE SARA AKASH AYAN JINKA WISHDHAR BHUJANG BHOJAN JINKA VE HI PHDIBHAND CHUDATE HAIN DHARTI KA HRADAY JUDATE HAIN. UTTAR KI PRATEEKHSA MAE

dr. sushila gupta के द्वारा
August 26, 2011

अंगार अधर पे धर मैं मुस्काया हूं.. मैं मर्घट से ज़िन्दगी बुला के लाया हूं.. हूं आंख-मिचौनी खेल चला किस्मत से.. सौ बार म्रत्यु के गले चूम आया हूं.. है नहीं स्वीकार दया अपनी भी.. तुम मत मुझपर कोई एह्सास बहुत अच्छा लिखा आपने ……प्रेरणार्थक रचना.




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