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अनुभूति

अंतस की पुकार पर चलती कलम

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लकड़ी से तगड़ी आरी –हास्य कविता (Hasya kavita)

पोस्टेड ओन: 16 May, 2011 जनरल डब्बा में

अशोक चक्रधर (Ashok Chakradhar) की हास्य कविताओं को मंच पर बहुत ही पसंद किया जा रहा है और इसीलिए आज एक बार फिर आप लोगों तक प्रसिद्ध हास्य कवि अशोक चक्रधर (Ashok Chakradhar) की एक हास्य रचना लाएं है जो वनों को बचाने का संदेश देती है. यह हास्य रचना ना सिर्फ मन में गुदगुदी लाती है बल्कि यह कविता हमें एक पाठ भी सिखाती है कि यदी हम वनों को यूं ही बर्बाद करते रहेंगे तो जल्द ही पछताएंगे भी.


funny-treeलकड़ी से तगड़ी आरी


जंगल में बंगले
बंगले ही बंगले
नए नए बनते गए
बंगले ही बंगले।


बंगलों में चारों ओर
जंगले ही जंगले
छोटे-छोटे बड़े-बड़े
जंगले ही जंगले

जंगल से काटी गई
लकड़ी ही लकड़ी,
चीरी गई पाटी गई
लकड़ी ही लकड़ी।

चौखट में द्वारों में
लकड़ी ही लकड़ी
फ़र्शों दीवारों में
लकड़ी ही लकड़ी।

मानुस ने मार बड़ी
मारी जी मारी,
लकड़ी से तगड़ी थी
आरी जी आरी।

आरी के पास न थीं
आंखें जी आंखें,
कटती गईं कटती गईं
शाखें ही शाखें।

बढ़ते गए बढ़ते गए
बंगले ही बंगले,
जंगल जी होते गए
कंगले ही कंगले।

हरा रंग छोड़ छाड़
भूरा भूरा रंग ले,
जंगल जी कंगले
या बंगले जी कंगले?




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1 प्रतिक्रिया

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नवीनतम प्रतिक्रियाएंLatest Comments

rajkamal के द्वारा
July 21, 2010

सही कहा ..पानी ही जीवन का आधार ..और अमृत है …




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